छत्तीसगढ़ में खाद्य सुरक्षा एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विश्लेषणात्मक अध्ययन

 

Geeta Nagvanshi, Omprakash Sinha

Guest Lecturer, Government Kaktiya PG College, Jagdalpur, Baster (C.G.), India.

*Corresponding Author E-mail: geetanagvanshi903@gmail.com, omprakashsinha87@gmail.com

 

ABSTRACT:

प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ में खाद्य सुरक्षा एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली का अध्ययन पर आधारित है। वर्तमान समय में सार्वजनिक वितरण प्रणाली उपभोक्ताओं को मुख्य रूप से चांवल, गेहूं, शक्कर, नमक, केरोसीन, का वितरण की व्यवस्था की गई है। प्रस्तुत अध्ययन शासकीय उचित मूल्य दुकान द्वारा संचालित सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर आधारित है अतः हम प्रस्तुत अध्ययन से यह जानने की कोशिश किया गया है कि यह दुकानें उपभोक्ताओं को कितनी मात्रा में पूर्ति कर रहे हैं। एवं इनकी और कितनी मात्रा में वस्तु पूर्ति की आवश्यकताएं हैं एवं मलिन बस्तियों के न्यादर्श द्वारा उपभोग की गई वस्तुओं से संतुष्टि का अध्ययन किया गया है। किसी क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा कितनी ही विशाल क्यों हो जनशक्ति के सहयोग के बिना निरर्थक है। जनशक्ति के आधार पर किसी प्रदेश की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तैयार होती है। जनसंख्या में वृद्धि होने के प्रमुख कारण प्रजननता, जन्मदर की अधिकता एवं मृत्यु की कमी, आवास, प्रवास, प्रशासनिक केन्द्र, राजनीतिक पृष्ठभूमि आर्थिक विकास इत्यादि है।

 

KEYWORDS: खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, उपभोक्ताओं, खाद्य पदार्थ, जनशक्ति, प्राकृतिक संपदा, उपभोग, प्रजननता, जन्मदर, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, प्रशासनिक केन्द्र, राजनीतिक पृष्ठभूमि आर्थिक विकास।

 


 


1. प्रस्तावना:-

हमारे देश को आजाद हुए आज सात दशक से भी अधिक समय बीत चुका है, लेकिन गरीबी, भूखमरी एवं कुपोषण आज भी प्रमुख समस्या बनी हुई है। गरीबी उन्मूलन हेतु केन्द्र सरकार द्वारा योजनाओं के माध्यम से कई प्रयास किए गए हैं। हमारी जनसंख्या में लगातार हो रही वृद्धि से गरीबी कम होने के विपरीत निरन्तर बढ़ती जा रही है। खाद्य उत्पादन भी निरन्तर बढ़ रहा है लेकिन जिस अनुपात में हमें खाद्यान्नों की जरूरत है वह पूरा नहीं हो पा रहा है। गौरतलब है कि देश में जनसंख्या व आय बढ़ने के साथ खाद्यान्नों की मांग तीव्र गति से बढ़ रही है। किन्तु खाद्यान्नों के उत्पादन में आशानुकूल वृद्धि नहीं होने के कारण खाद्यान्नों की मांग व पूर्ति में अंतराल बढ़ता जा रहा है। इसी वजह से खाद्यान्नों की कीमतों में बढ़ोत्तरी हो रही है तथा जनसामान्य को समुचित मात्रा में उचित कीमतों पर खाद्यान्न उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। एक तो खाद्यान्नों के उत्पादन में मानसून के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। दूसरा चंूकि खाद्यान्नों का व्यापार निजी व्यापारियों के हाथ में है इसलिए वे लाभ अर्जन की दृष्टि से कृत्रिम कमी के द्वारा या खाद्यान्न दबाकर मूल्य में वृद्धि लाने की कोशिश करता है। तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि भारत में गरीबी रेखा से जीवन यापन करने वालों की संख्या बहुत अधिक है, और ये गरीब लोग खाद्यान्नों को बाजार मूल्य पर क्रय करने की स्थिति में नहीं होते हैं। स्वतंत्रता के बाद खाद्यान्नों की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने ‘राशनिंग’ का सहारा लिया। जिसे 1954 में समाप्त कर दिया गया क्योंकि खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि हुयी। किन्तु मूल्यों में पुनः वृद्धि के कारण 1955 में आंशिक राशनिंग फिर शुरू हुयी। 1959 में खाद्यान्नों में ‘राज्य द्वारा थोक व्यापार’ के प्रयोग शुरू किया। इस नीति के तहत राज्य व्यापार गेहूं तथा चांवल दो खाद्यान्नों तक ही सीमित रखा गया किंतु इस नीति में भी कई कठिनाईयां आयी। देश की समग्र जनसंख्या को ‘खाद्य सुरक्षा’ प्रदान करने के लिए खाद्य की भौतिक उपलब्धि आवश्यक है। इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए पर्याप्त खाद्य उपलब्धता हेतु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् ही भारतीय नियोजकों ने खाद्यान्नों के संदर्भ में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लक्ष्य को सर्वाेच्च प्राथमिकता प्रदान की ताकि विदेशों पर खाद्यान्न सम्बन्धी निर्भरता को समाप्त किया जा सके।

 

2. शोध प्रविधि:- प्रस्तुत शोध अध्ययन हेतु ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति का प्रयोग किया गया है जिससे तहत छत्तीसगढ़ में खाद्य सुरक्षा एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली का अंकन किया गया है और प्रस्तावित अध्ययन प्रथमिक एवं द्वितीयक समंकों पर आधारित होगा, प्राथमिक समंकों का संकलन प्रत्यक्ष साक्षात्कार, प्रष्नावली, अनुसूची के माध्यम से किया जायेगा तथा द्वितीय समंकों का संकलन छत्तीसगढ़ राज्य अन्य पिछड़ा आयोग, जनसंपर्क छत्तीसगढ़ शासन, छत्तीसगढ़ शासन, छत्तीसगढ़ संचानालय, शोध पत्रिका, शोध पत्र एवं समाचार पत्र, छत्तीसगढ. राजपत्र, छत्तीसगढ़ महिला बालविकास, केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन, छत्तीसगढ़ महिला आरक्षण केन्द्र तथा अन्य शासकीय, अर्द्धषासकीय संस्थानों द्वारा प्रकाषित प्रतिवेदनों की सहायता से संकलित किया जायेगा।

 

3. अध्ययन का उद्देश्य:

छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना।

 

4. अध्ययन की परिकल्पनाएं:

छत्तीसगढ़ में रहने वाले परिवारों की खाद्य सुरक्षा एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मध्य सम्बन्ध नहीं है।

 

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा:- गरीब और जरूरतमन्दों को भोजन का अधिकार सुनिश्चित करने तथा पात्रता अनुसार राशन सामग्री उपलब्ध कराने हेतु छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम, 2012 (क्रमांक 5, सन् 2013) की अधिसूचना दिनांक 18 जनवरी, 2013 को सर्वसाधारण की जानकारी हेतु प्रकाशित की गयी। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नानुसार हैं-

अधिनिमय की धारा 15 के अन्तर्गत राशन सामग्री की पात्रता हेतु परिवारों की श्रेणियां निम्नानुसार हैं:-

(अ) अन्त्योदय परिवार,

(ब) प्राथमिकता परिवार,

 

अन्त्योदय परिवार:-

छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम की धारा 15 की उपधारा (2) में अन्त्योदय परिवारों की श्रेणी में ऐसे परिवारों को सम्मिलित करने का प्रावधान किया गया है जो विशेष कमजोर सामाजिक समूहों के अन्तर्गत चिन्हांकित किए गए हों। विशेष रूप से कमजोर सामाजिक समूह में शामिल हैं-केन्द्र सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित विशेष कमजोर जनजाति समूह के समस्त परिवार, ऐसे परिवार जिसके मुखिया विधवा अथवा एकाकी महिला है, मुखिया लाईलाज बीमारी से पीड़ित है, मुखिया निःशक्त व्यक्ति हैं, मुखिया 60 वर्ष या इससे अधिक आयु के हैं और जिनके पास आजीविका के सुनिश्चित साधन या सामाजिक सहायता नहीं है, मुखिया विमुक्त बंधवा मजदूर है और परिवारों का कोई अन्य समूह जैसा कि राज्य सरकार द्वारा विहित किया जावे।

 

प्राथमिकता परिवार:-

इस श्रेणी के अन्तर्गत मुख्यमन्त्री खाद्यान्न सहायता योजना के अधीन उनकी पात्रता की सीमा तक समस्त परिवार खाद्य सामग्री प्राप्त करने हेतु मुख्यमन्त्री खाद्यान्न सहायता योजना के अधीन विनिर्दिष्ट मानदण्डों के अनुसार पात्र हैं। इसके अतिरिक्त भूमिहीन कृषि मजदूरों के समस्त परिवार, सीमान्त एवं लघु कृषकों के समस्त परिवार, ऐसे परिवार जिसके मुखिया असंगठित श्रमकार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 के अन्तर्गत असंगठित श्रमिक के रूप में पंजीकृत हैं तथा समस्त परिवार जिसके मुखिया भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार अधिनियम, 1996 के अन्तर्गत पंजीकृत निर्माण श्रमिक हैं, उन्हें प्राथमिकता वाले परिवार की श्रेणी में शामिल किया गया है। अन्त्योदय परिवारों एवं प्राथमिकता परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए निम्नानुसार राशन सामग्रियों की पात्रता है-

 

सारणी क्रमांक 1.1: राशन सामग्री की पात्रता

क्र.

 

परिवार का प्रकार

खाद्य पदार्थ

मासिक पात्रता

उपभोक्ता दर

1.

अन्त्योदय परिवार

चावल

35 किग्रा प्रतिमाह

1 रूपये प्रति किग्रा

चना

2 किग्रा प्रति परिवार अनुसूचित क्षेत्र में

5 रूपये प्रति किग्रा

रिफाईन्ड आयोडाइज्ड नमक

अनुसूचित क्षेत्र में 2 किग्रा प्रति परिवार

निःशुल्क

गैर अनुसूचित क्षेत्र में 1 किग्रा प्रति परिवार

निःशुल्क

2.

प्राथमिकता परिवार

खाद्यान्न

7 किलोग्राम प्रति सदस्य, प्रतिमाह

1 रूपये प्रति किग्रा

चना

2 कि.ग्रा. प्रति परिवार अनुसूचित क्षेत्र में

5 रूपये प्रति किग्रा

रिफाईन्ड आयोडाइज्ड नमक

अनुसूचित क्षेत्र में 2 कि.ग्रा. प्रति परिवार

निःशुल्क

गैर अनुसूचित क्षेत्र में 1 कि.ग्रा. प्रति परिवार

निःशुल्क

स्त्रोतः-खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग, वार्षिक प्रशासकीय प्रतिवेदन 2016-17,

 

प्रमुख टीप:-

·       चने की पात्रता, राज्य के अनुसूचित क्षेत्र में निवास करने वाले समस्त अन्त्योदय तथा प्राथमिकता वाले राशनकार्डधारी परिवारों को है।

·       उपरोक्त सामग्री के अतिरिक्त अन्त्योदय एवं प्राथमिकता परिवारों को प्रति कार्ड 1 किलो शक्कर की पात्रता है।

·       अन्त्योदय एवं प्राथमिकता परिवार वाले परिवार वाले राशनकार्डधारियों को केरोसिन की पात्रता है।

 

विभिन्न हितग्राही समूहों की पात्रताएं:-

इस अधिनियम के अन्तर्गत खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की दृष्टि से विभिन्न हितग्राही समूहों हेतु निम्नलिखित प्रावधान है-

1.  गर्भवती महिलाओं और शिशुवती माताओं को आंगनबाड़ी के माध्यम से निःशुल्क पोषक आहार।

2.  छः माह से छः वर्ष के आयु समूहों के बच्चों को स्थानीय आंगनबाड़ी के माध्यम से निःशुल्क पोषण आहार।

3.  6 वर्ष से 14 वर्ष के आयु समूह के बच्चों को सरकार, सरकार द्वारा सहायता प्राप्त विद्यालयों, स्थानीय निकायों द्वारा चलाए जा रहे विद्यालयों में आठवीं कक्षा तक के बच्चों को शाला दिवस में निःशुल्क मध्यान्ह भोजन।

4.  आश्रम/छात्रावासों में निवासरत छात्र/छात्राओं हेतु रियायती दर पर खाद्यान्न।

5.  कुपोषित बच्चों की पहचान व उन्हें निःशुल्क उचित पोषक आहार।

6.  आपातकालीन अथवा प्राकृतिक आपदाओं की परिस्थितियों में प्रभावित व्यक्तियों हेतु छः माह तक निःशुल्क भोजन की व्यवस्था।

 

खाद्य अधिकार पुस्तिका (राशनकार्ड):

छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम, 2012 के तहत खाद्य अधिकार पुस्तिका अथवा राशनकार्ड जारी करने हेतु पात्र अन्त्योदय एवं प्राथमिकता परिवार के चिन्हांकन हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों तथा नगरीय क्षेत्रों में नगर निगम/नगरपालिका/नगर पंचायत को अधिकार है।

 

सारणी क्रमांक 1.2: योजनावार कुल राशनकार्डों की जानकारी

अन्त्योदय परिवार (गुलाबी)

प्राथमिकता परिवार (नीला)

एकल निराश्रित (गुलाबी)

अन्नपूर्णा (गुलाबी)

निःशक्तजन (हरा)

योग

14]88]898

42]84]767

61]071

7]958

8]111

58]50]805

स्त्रोतः-खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग, वार्षिक प्रशासकीय प्रतिवेदन 2016-17

 

छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम, 2012 के अन्तर्गत अन्त्योदय परिवारों को गुलाबी एवं प्राथमिकता वाले परिवारों को नीला राशनकार्ड जारी किया गया है। 25 जनवरी 2017 की स्थिति में प्रदेश में अन्त्योदय, प्राथमिकता एवं निःशक्तजन (हरा) के हितग्राहियों को कुल 58.50 लाख राशनकार्ड जारी किया गया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम, 2012 के अन्तर्गत राशनकार्ड के हितग्राहियों की पात्रता का आधार निम्नानुसार है-

 

अन्त्योदय परिवार (गुलाबी राशनकार्ड):

भारत सरकार द्वारा राज्य हेतु अन्त्योदय परिवारों की संख्या 7,18,900 निर्धारित की गई है। छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम, 2012 के अन्तर्गत राज्य के विशेष कमजोर सामाजिक समूहों के 25 जनवरी, 2017 की स्थिति में 14,88,898 अन्त्योदय राशनकार्ड प्रचलित हैं।

 

प्राथमिकता परिवार (नीला राशनकार्ड):

छत्तीसगढ़ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत भूमिहीन मजदूर, सीमान्त एवं लघु कृषक, असंगठित श्रमकार, सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 तथा भवन एवं अन्य सन्निर्माण मजदूर अधिनियम, 1996 के अन्तर्गत पंजीकृत श्रमिकों को नीला राशनकार्ड जारी किया गया है। 25 जनवरी, 2017 की स्थिति में 42,84,767 नीला राशनकार्ड प्रचलित है।

 

एकल निराश्रित (गुलाबी) राशनकार्ड:

मुख्यमन्त्री खाद्यान्न सहायता योजना के अन्तर्गत एकल निराश्रित पेंशनधारियों को एकल निराश्रित (गुलाबी) राशनकार्ड जारी किया गया है। 25 जनवरी, 2017 की स्थिति में 61,071 एकल निराश्रित (गुलाबी) राशनकार्ड प्रचलित है।

 

अन्नपूर्णा (गुलाबी) राशनकार्ड:

मुख्यमन्त्री खाद्यान्न सहायता योजना के अन्तर्गत अन्नपूर्णा योजना के 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के ऐसे बेसहारा वृद्ध जो वृद्धावस्था पेंशन प्राप्त करने की पात्रता रखते हैं, किन्तु उन्हें वृद्धावस्था पेंशन का लाभ नहीं मिल पा रहा है, उन्हें अन्नपूर्णा (गुलाबी) राशनकार्ड जारी किया गया है। 25 जनवरी, 2017 की स्थिति में 7,958 अन्नपूर्णा (गुलाबी) राशनकार्ड प्रचलित है।

 

निःशक्तजन (हरा राशनकार्ड):

मुख्यमन्त्री खाद्यान्न सहायता योजना के अन्तर्गत प्रदेश में चिन्हांकित 8,111 निःशक्तजनों को हरा राशनकार्ड जारी किया गया है।

 

5. अध्ययन का महत्व:

प्रस्तुत शोध अध्ययन में छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली लक्षित सीमा तक नहीं पहुंच सका है। इसके मूल में शासकीय प्रयासों की असफलता के साथ इन परिवारों की सामाजिक व क्षेत्रीय कारक भी जिम्मेदार हैं। छत्तीसगढ़ में परिवारों की आय निम्न होने के कारण इनमें निर्धनता एवं गरीबी भयावह समस्या है। समूह अत्यंत दयनीय स्थिति से गुजर रही है, जिनमें दरिद्रता, बेकारी, महंगाई, निम्न आय स्तर, बिजली, पानी व स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव तथा कृषि का अपरिपक्व होना प्रमुख है। जोकि इनके विकास में पिछड़ेपन का प्रमुख कारण है। इनके सतत् विकास के लिए खाद्य सुरक्षा के अन्तर्गत चलाए जा रहे सार्वजनिक वितरण प्रणाली नीतियों के द्वारा इनके विकास में और अधिक सहायता प्रदान की जाएगी। जो इनके जीवन स्तर को ऊॅंचा उठाने में सहायक होगी।

 

6. निष्कर्ष:-

खाद्य सुरक्षा अधिनियम गरीबी रेखा से नीचे निवासरत लोगों की आर्थिक सुरक्षा हेतु एक महत्वपूर्ण आयाम बन चुका है। किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी चुनौती इस बात की होती है कि दो वक्त की रोटी मिल सके। यह एक कल्याणकारी राज्य की बड़ी जिम्मेदारी भी है। राज्य के द्वारा इस योजना ने न सिर्फ आर्थिक सुरक्षा प्रदान की है बल्कि इनकी सामाजिक सांस्कृतिक स्थिति को भी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इस योजना के द्वारा लोगों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने हेतु कई उपायों को शामिल किए जाने की नितांत आवश्यकता है। प्रदेश के अन्य नगरों में वर्तमान में जो जनसंख्या वृद्धि हेतु उत्तरदायी हैं उन्हें छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में भी लागू किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ राज्य होने के कारण भी विकास का नया अवसर निरन्तर प्राप्त होता रहा है, अतः आवास समस्या की गंभीरता भी अधिक समस्या के एक परिणाम के रूप में भी देखा जाना चाहिए। शहरों में मलिन बस्तियों का उदय एवं उनका स्वभाव अकेले औद्योगीकरण का परिणाम नहीं कहा जा सकता। छत्तीसगढ़ के जनता के सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण करने से अनेक सारगर्भित तत्व प्रस्तुत होते हैं जिनका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव उनके दृष्टिकोण एवं अभिवृत्तात्मक उन्मेष पर पड़ता है।

 

7. संदर्भ ग्रंथ सूची:-

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9.   Experiential Household Food Insecurity in an Urban Underserved Slum of North India.

10. Food Insecurity at Household Cevel in Rural India: A Case Study of Uttar Pradesh. 2(8): 227-230

11. Sen, A.K. Poverty and Famine: An Essay on Entitlement and Deprivation.  Oxford University Press, New Delhi. 1981

 

 

Received on 11.04.2025      Revised on 26.04.2025

Accepted on 07.05.2025      Published on 04.06.2025

Available online from June 07, 2025

Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(2):80-84.

DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00013

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